प्रेरक प्रसंग

Friday, August 16, 2019

तजुर्बे का फल

तजुर्बे का फल

*सेठ करोड़ी मल पैसे से तो करोड़पति था मगर खरच करने के मामले में* *महाकंजूस। उसका ये हाल था कि चमड़ी जाये पर दमड़ी न जाए। उस की इस आदत से उसके बीवी बच्चे बहुत परेशान थे। सब कुछ होते हुए भी करोड़ी मल खाने पीने* *तक में कंजूसी करता था। उसका बस चले तो घर में आलू और दाल के अलावा* *कुछ नहीं बनना चाहिये। सेठ के पड़ौस में ही कल्लू नाम के एक ग़रीब मज़दूर का घर था। कल्लू एक दम फक्कड़ों की तरह रहता था। जो भी कमाता था, अपने बीवी बच्चों के खाने पिलाने में खरच कर देता था।*

*उस के घर में रोज़ हलवा पूरी बनते थे और वो सीना तान कर मस्ती की चाल से चलता था। कल्लू के रहन सहन को देख कर सेठ के* *बड़े लड़के लक्ष्मी नारायण को बहुत कष्ट होता था। एक दिन जब उस से रहा नहीं* *गया तो बाप से जाकर बोला,* *“पिताजी क्या बात है कि हमारे पास सब कुछ होते हुए भी हम ग़रीबों की तरह रहते हैं, छोटी-छोटी चीज़ों के लिए आप के आगे हाथ फैलाना* *पड़ता है।*
*ज़रा उधर कल्लू को तो देखो।* *ग़रीब मज़दूर है मगर दिल बादशाहों जैसा है। तबियत से बाल बच्चों पर खरच करता है और मस्त रहता है। आखिर बात क्या है।” सेठ ने लक्ष्मी* *नारायण की बात बहुत ग़ौर से सुनी। थोड़ी देर चुप रहकर बोला कि “बेटा लक्ष्मी, तुम जो भी कह रहे हो एक दम सच कह रहे हो। हम दोनों में बस इतना अंतर है कि कल्लू अभी तक निन्यानवे के चक्कर में नहीं पड़ा है।*
*जिस दिन इस चक्रव्यूह में फँस जाएगा, उस दिन सब हेकड़ी निकल जाएगी।”* *पिता की बात लक्ष्मी को बिल्कुल नहीं जँची और वो बाप से रोज़ बस कल्लू के बारे में ही सवाल करता था।* *एक दिन सेठ ने लक्ष्मी को बुलाकर आदेश दिया कि “शाम को दुकान बन्द करके तुम जब घर आओगे तो पेटी में से एक पोटली में निन्यानवे रूपये डाल कर ले आना। ध्यान रहे कि रूपये निन्यानवे ही हों।”*
*पिता की आज्ञानुसार लक्ष्मी ने वो ही किया जो सेठ ने कहा था और शाम को* *पोटली पिता के हाथ में थमा दी। थोड़ा अन्धेरा पड़ने पर सेठ ने बेटे को अपने साथ चलने को कहा। जब वो* *कल्लू के घर के पास पहुँचे तो सेठ ने चुपके से पोटली कल्लू के आँगन में फेंक दी और अपने घर वापिस आ गया।* *सुबह जब कल्लू ने पोटली देखी तो उसकी उत्सुकता *बहुत बढ़ गई। खोल कर देखा तो उस में निन्यानवे *रूपये मिले। कल्लू सोचने लगा और अपने में* *हीबुड़बुड़ाने लगा, “हे ऊपर वाले, अगर देने ही* *थे तो पूरे एक सौ क्यों नहीं दिये, ये एक रूपया कम क्यों दिया।” अब सारा दिन कल्लू इसी सोच में पड़ गया कि पोटली में सौ रूपये कैसे बनें। एक रूपया बचाने के लिए *उस ने पहिले अपने रहन सहन में कमी कर दी, फिर खाने पीने में भी कटौती कर दी। जब सौ पूरे हो गए तो कल्लू ने सोचा कि अब इनको एक सौ एक कैसे बनाऊँ।*
*सौ से एक सौ एक, एक सौ एक से एक सौ दो, एक सौ दो से एक सौ तीन, बस कल्लू* *इसी चक्कर में पड़ गया और पैसा जोड़ने के फेर में रोज़ जो हलवा पूरी बनते थे वो सब बन्द हो गये। सारा दिन कल्लू बस पोटली में रूपया बढ़ाने की फिकर में रहने लगा और जहाँ भी मौका मिलता था वहीं पैसा बचाने की कोशिश करता। पड़े निन्यानवे के चक्कर में, भूल गए हलवा पूरी कैसे रूपैया एक जुड़ाऊँ, पोटली अभी रही अधूरी*
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Thursday, August 15, 2019

मूर्खों का साथ हमेशा दुखदायी

मूर्खों का साथ हमेशा दुखदायी

विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय जहां कहीं भी जाते, जब भी जाते, अपने साथ हमेशा तेनालीराम को जरूर ले जाते थे। इस बात से अन्य दरबारियों को बड़ी चिढ़ होती थी।

एक दिन तीन-चार दरबारियों ने मिलकर एकांत में महाराज से प्रार्थना की, ‘महाराज, कभी अपने साथ किसी अन्य व्यक्ति को भी बाहर चलने का अवसर दें।’ राजा को यह बात उचित लगी।

उन्होंने उन दरबारियों को विश्वास दिलाया कि वे भविष्य में अन्य दरबारियों को भी अपने साथ घूमने-फिरने का अवसर अवश्य देंगे।

एक बार जब राजा कृष्णदेव राय वेष बदलकर कुछ गांवों के भ्रमण को जाने लगे तो अपने साथ उन्होंने इस बार तेनालीराम को नहीं लिया बल्कि उसकी जगह दो अन्य दरबारियों को साथ ले लिया।

घूमते-घूमते वे एक गांव के खेतों में पहुंच गए। खेत से हटकर एक झोपड़ी थी, जहां कुछ किसान बैठे गपशप कर रहे थे। राजा और अन्य लोग उन किसानों के पास पहुंचे और उनसे पानी मांगकर पिया।

फिर राजा ने किसानों से पूछा, ‘कहो भाई लोगों, तुम्हारे गांव में कोई व्यक्ति कष्ट में तो नहीं है? अपने राजा से कोई असंतुष्ट तो नहीं है?’

इन प्रश्नों को सुनकर गांव वालों को लगा कि वे लोग अवश्य ही राज्य के कोई अधिकारीगण हैं।

वे बोले, ‘महाशय, हमारे गांव में खूब शांति है, चैन है। सब लोग सुखी हैं। दिनभर कडी़ मेहनत करके अपना कामकाज करते हैं और रात को सुख की नींद सोते हैं। किसी को कोई दुख नहीं है।

राजा कृष्णदेव राय अपनी प्रजा को अपनी संतान की तरह प्यार करते हैं इसलिए राजा से असंतुष्ट होने का सवाल ही नहीं पैदा होता।

इस गांव के लोग राजा को कैसा समझते हैं?’ राजा ने एक और प्रश्न किया।

राजा के इस सवाल पर एक बूढ़ा किसान उठा और ईख के खेत में से एक मोटा-सा गन्ना तोड़ लाया। उस गन्ने को राजा को दिखाता हुआ वह बूढ़ा किसान बोला, ‘श्रीमानजी, हमारे राजा कृष्णदेव राय बिलकुल इस गन्ने जैसे हैं।’

अपनी तुलना एक गन्ने से होती देख राजा कृष्णदेव राय सकपका गए। उनकी समझ में यह बात बिलकुल भी न आई कि इस बूढ़े किसान की बात का अर्थ क्या है? उनकी यह भी समझ में न आया कि इस गांव के रहने वाले अपने राजा के प्रति क्या विचार रखते हैं?

राजा कृष्णदेव राय के साथ जो अन्य साथी थे, राजा ने उन साथियों से पूछा, ‘इस बूढ़े किसान के कहने का क्या अर्थ है?’

साथी राजा का यह सवाल सुनकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। फिर एक साथी ने हिम्मत की और बोला, ‘महाराज, इस बूढ़े किसान के कहने का साफ मतलब यही है कि हमारे राजा इस मोटे गन्ने की तरह कमजोर हैं। उसे जब भी कोई चाहे, एक झटके में उखाड़ सकता है, जैसे कि मैंने यह गन्ना उखाड़ लिया है।’

राजा ने अपने साथी की इस बात पर विचार किया तो राजा को यह बात सही मालूम हुई। वे गुस्से से भर गए और इस बूढ़े किसान से बोले, ‘तुम शायद मुझे नहीं जानते कि मैं कौन हूं?’ राजा की क्रोध से भरी वाणी सुनकर वह बूढ़ा किसान डर के मारे थर-थर कांपने लगा।

तभी झोपड़ी में से एक अन्य बूढ़ा उठ खड़ा हुआ और बड़े नम्र स्वर में बोला- ‘महाराज, हम आपको अच्छी तरह जान गए हैं, पहचान गए हैं, लेकिन हमें दुख इस बात का है कि आपके साथी ही आपके असली रूप को नहीं जानते।

मेरे साथी किसान के कहने का मतलब यह है कि हमारे महाराज अपनी प्रजा के लिए तो गन्ने के समान कोमल और रसीले हैं किंतु दुष्टों और अपने दुश्मनों के लिए महानतम कठोर भी।’ उस बूढ़े ने एक कुत्ते पर गन्ने का प्रहार करते हुए अपनी बात पूरी की।

इतना कहने के साथ ही उस बूढ़े ने अपना लबादा उतार फेंका और अपनी नकली दाढ़ी-मूंछें उतारने लगा।

उसे देखते ही राजा चौंक पड़े। ‘तेनालीराम, तुमने यहां भी हमारा पीछा नहीं छोड़ा।

तुम लोगों का पीछा कैसे छोड़ता भाई? अगर मैं पीछा न करता तो तुम इन सरल हृदय किसानों को मौत के घाट ही उतरवा देते। महाराज के दिल में क्रोध का ज्वार पैदा करते, सो अलग।’

तुम ठीक ही कह रहे हो तेनालीराम। मूर्खों का साथ हमेशा दुखदायी होता है। भविष्य में मैं कभी तुम्हारे अलावा किसी और को साथ नहीं रखा करूंगा।’

उन सबकी आपस की बातचीत से गांव वालों को पता चल ही गया था कि उनकी झोपड़ी पर स्वयं महाराज पधारे हैं और भेष बदलकर पहले से उनके बीच बैठा हुआ आदमी ही तेनालीराम है तो वे उनके स्वागत के लिए दौड़ पड़े।*

कोई चारपाई उठवाकर लाया तो कोई गन्ने का ताजा रस निकालकर ले आया। गांव वालों ने बड़े ही मन से अपने मेहमानों का स्वागत किया। उनकी आवभगत की। राजा कृष्णदेव राय उन* *ग्रामवासियों का प्यार देखकर आत्मविभोर हो गए। तेनालीराम की चोट से आहत हुए दरबारी मुंह लटकाए हुए जमीन कुरेदते रहे और तेनालीराम मंद-मंद मुस्करा रहे थे।

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Friday, August 2, 2019

मोर और कौआ हिंदी कहानी

              मोर और कौआ हिंदी कहानी


एक दिन कौए ने जंगल में मोरों की बहुत- सी पूंछें बिखरी पड़ी देखीं. वह अत्यंत प्रसन्न होकर कहने लगा- वाह भगवान! बड़ी कृपा की आपने, जो मेरी पुकार सुन ली. मैं अभी इन पूंछों से अच्छा खासा मोर बन जाता हूं. इसके बाद कौए ने मोरों की पूंछें अपनी पूंछ के आसपास लगा ली. फिर वह नया रूप देखकर बोला- अब तो मैं मोरों से भी सुंदर हो गया हूं. अब उन्हीं के पास चलकर उनके साथ आनंद मनाता हूं. वह बड़े अभिमान से मोरों के सामने पहुंचा. उसे देखते ही मोरों ने ठहाका लगाया. एक मोर ने कहा- जरा देखो इस दुष्ट कौए को. यह हमारी फेंकी हुई पूंछें लगाकर मोर बनने चला है. लगाओ बदमाश को चोंचों व पंजों से कस-कसकर ठोकरें. यह सुनते ही सभी मोर कौए पर टूट पड़े और मार-मारकर उसे अधमरा कर दिया.

कौआ भागा-भागा अन्य कौए के पास जाकर मोरों की शिकायत करने लगा तो एक बुजुर्ग कौआ बोला- सुनते हो इस अधम की बातें. यह हमारा उपहास करता था और मोर बनने के लिए बावला रहता था. इसे इतना भी ज्ञान नहीं कि जो प्राणी अपनी जाति से संतुष्ट नहीं रहता, वह हर जगह अपमान पाता है. आज यह मोरों से पिटने के बाद हमसे मिलने आया है. लगाओ इस धोखेबाज को.

इतना सुनते ही सभी कौओं ने मिलकर उसकी अच्छी धुलाई की.

कहानी का सन्देश यह  है कि ईश्वर ने हमें जिस रूप और आकार में बनाया है, हमें उसी में संतुष्ट रहकर अपने कर्मो पर ध्यान देना चाहिए. कर्म ही महानता का द्वार खोलता है.

               वापस साइट पर जाने के यहां क्लिक करें
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Sunday, July 28, 2019

सकारात्मक सोच का महत्व


आज का प्रेरक प्रसंग
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सकारात्मक सोच का महत्व

एक व्यक्ति ऑटो से रेलवे स्टेशन जा रहा था। ऑटो वाला बड़े आराम से ऑटो चला रहा था। एक कार अचानक ही पार्किंग से निकलकर रोड पर आ गई। ऑटो ड्राइवर ने तेजी से ब्रेक लगाया और कार, ऑटो से टकराते-टकराते बची।

कार चला रहा आदमी गुस्से में ऑटोवाले को ही भला-बुरा कहने लगा जबकि गलती उसकी थी! ऑटो चालक एक सत्संगी (सकारात्मक विचार सुनने-सुनाने वाला) था। उसने कार वाले की बातों पर गुस्सा नहीं किया और क्षमा माँगते हुए आगे बढ़ गया।

ऑटो में बैठे व्यक्ति को कार वाले की हरकत पर गुस्सा आ रहा था और उसने ऑटो वाले से पूछा... तुमने उस कार वाले को बिना कुछ कहे ऐसे ही क्यों जाने दिया।उसने तुम्हें भला-बुरा कहा जबकि गलती तो उसकी थी।

हमारी किस्मत अच्छी है.... नहीं तो उसकी वजह से हम अभी अस्पताल में होते।

ऑटो वाले ने बहोत मार्मिक जवाब दिया...... "साहब,. बहुत से लोग गार्बेज ट्रक (कूड़े का ट्रक) की तरह होते हैं। वे बहुत सारा कूड़ा अपने दिमाग में भरे हुए चलते हैं।......

जिन चीजों की जीवन में कोई ज़रूरत नहीं होती उनको मेहनत करके जोड़ते रहते हैं जैसे.... क्रोध, घृणा, चिंता, निराशा आदि। जब उनके दिमाग में इनका कूड़ा बहुत अधिक हो जाता है.... तो, वे *अपना बोझ हल्का करने के लिए इसे दूसरों पर फेंकने का मौका ढूँढ़ने लगते हैं।

इसलिए .....मैं ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ और उन्हें दूर से ही मुस्कराकर अलविदा कह देता हूँ। क्योंकि ....अगर उन जैसे लोगों द्वारा गिराया हुआ कूड़ा मैंने स्वीकार कर लिया..... तो, मैं भी कूड़े का ट्रक बन जाऊँगा और अपने साथ-साथ आसपास के लोगों पर भी वह कूड़ा गिराता रहूँगा।

मैं सोचता हूँ जिंदगी बहुत ख़ूबसूरत है इसलिए...... जो हमसे अच्छा व्यवहार करते हैं उन्हें धन्यवाद कहो और जो हमसे अच्छा व्यवहार नहीं करते उन्हें मुस्कुराकर भुला दो।

हमें यह याद रखना चाहिए कि सभी मानसिक रोगी केवल अस्पताल में ही नहीं रहते हैं....... कुछ हमारे आसपास खुले में भी घूमते रहते हैं!

प्रकृति के नियम:-

यदि खेत में बीज न डाले जाएँ..... तो, कुदरत उसे घास-फूस से भर देती है।

उसी तरह से...... यदि दिमाग में सकारात्मक विचार न भरें जाएँ तो नकारात्मक विचार अपनी जगह बना ही लेते हैं।

दूसरा नियम है कि

जिसके पास जो होता है वह वही बाँटता है।....... “सुखी” सुख बाँटता है, “दुखी” दुख बाँटता है, “ज्ञानी” ज्ञान बाँटता है," "भ्रमित भ्रम बाँटता है" और.... “भयभीत” भय बाँटता है। जो खुद डरा हुआ है वह, औरों को डराता है, दबा हुआ दबाता है, चमका हुआ चमकाता है।

इसलिए.... नकारात्मक लोगों से दूरी बनाकर खुद को नकारात्मकता से दूर रख्खें। और जीवन में सकारात्मकता अपनाएं
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Wednesday, July 10, 2019

चरित्र

     चरित्र

नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बनने के बाद, अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक रेस्तरां में खाना खाने गए । सबने अपनी अपनी पसंद के खाना का आर्डर दिया और खाना के आने का इंतजार करने लगे ।
उसी समय मंडेला की सीट के सामने एक व्यक्ति भी अपने खाने आने का इंतजार कर रहा था । मंडेला ने अपने सुरक्षा कर्मी को कहा उसे भी अपनी टेबल पर बुला लो । ऐसा ही हुआ, खाना आने के बाद सभी खाने लगे,  वो आदमी भी अपना खाना खाने लगा, पर उसके हाथ खाते हुए कांप रहे थे।

खाना खत्म कर वो आदमी सिर झुका कर होटल से निकल गया । उस आदमी के खाना खा के जाने के बाद मंडेला के सुरक्षा अधिकारी ने मंडेला से कहा कि वो व्यक्ति शायद बहुत बीमार था, खाते वक़्त उसकी हाथ लगातार कांप रहे थे और वह कांप भी रहा था ।
मंडेला ने कहा नहीं  ऐसा नहीं है ।वह उस जेल का जेलर था, जिसमें मुझे रखा गया था । कभी मुझे जब यातनाएं दी जाती और मै कराहते हुवे पानी मांगता तो ये मेरे ऊपर पेशाब करता था ।

मंडेला ने कहा  मै अब राष्ट्रपति बन गया हूं, उसने समझा कि मै भी उसके साथ ऐसा ही व्यवहार करूंगा । पर मेरा यह चरित्र नहीं है । मुझे लगता है बदले की भावना से काम करना विनाश की ओर ले जाता है । वहीं धैर्य और सहिष्णुता की मानसिकता हमें विकास की ओर ले जाती है

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दान का फल

प्रेरक प्रसंग
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दान का फल!!!!!

दान भी दुःख और भोग का कारण बन सकता हैं।दान देने से पहले जरा सोच लें ?* दान करना हमारे समाज में अति शुभ माना गया है। लेकिन कई बार यह दान दुःख का कारण भी बन जाता है।

हमारे आसपास ऐसे कई व्यक्ति है जो कि ज्यादा दान या ज्यादा धर्म में लीन रहते है। फिर भी कष्ट उनका व उनके परिवार का पीछा नहीं छोड़ता तब हम अपने को सांत्वना स्वरूप यह कह कर संतोष करते है कि भगवान शायद हमारी परीक्षा ले रहा है।

अरे भाई भगवान् कोई तुम्हारी परीक्षा-वरीक्षा नही ले रहा, बल्कि वो तो तुम्हारे ही कर्मो का फल तुम्हे दे रहा है। बहुत दान धर्म करने के बाद भी सुख नही मिलता क्योकि तुम्हारे द्वारा दिया दान ही दुःख का कारण बन जाता है।

एक समय की बात है। एक बार एक गरीब आदमी एक सेठ के पास जाता है और भोजन के लिए सहायता मांगता है।

सेठ बहुत धर्मात्मा होता है वो उसे पैसे देता है। पैसे लेकर व्यक्ति भोजन करता है, और उसके पास कुछ पैसे बचते है जिससे वो शराब पी लेता है शराब पीकर घर जाता है और अपनी पत्नी को मारता है।पत्नी दुखी होकर अपने दो बच्चो के साथ तालाब में कूद कर आत्म हत्या कर लेती है। कुछ समय बाद उस सेठ की भी असाध्य रोग से मृत्यु हो जाती है मरने के बाद सेठ जब ऊपर जाता है तब यमराज बोलते है कि इसको नरक में फेंक दो।

सेठ यह सुनकर यमराज से कहता है कि आपसे गलती हुई है, मैने तो कभी कोई पाप भी नही किया है, बल्कि जब भी कोई मेरे पास आया है मेने उसकी हमेशा मदद ही की है। इसलिये मुझे एक बार भगवान् से मिला दो। तब यमराज उसे बोलते है कि हमारे यहाँ तो गलती की कोई संभावना नही है, गलतिया तो तुम लोग ही करते हो। पर सेठ के बहुत कहने पर यमराज उसे भगवान् के समक्ष पेश करते है।

भगवान् के सामने जाकर सेठ बोलता हे प्रभु मैने तो कोई पाप किया ही नही है तो मुझे नरक क्यों दिया जा रहा है। तब भगवान् उसे उस गरीब व्यक्ति को पैसे देने वाली बात बताते है कि उस व्यक्ति की पत्नी और दो बच्चो की जीव हत्या का कारण तू है।

तू उसे पैसे न देता तो वो शराब पीकर अपनी पत्नी को दुःख नही देता। सेठ बोलता है प्रभु मेने तो एक गरीब को दान दिया है और शास्त्रों में भी दान देने की बात लिखी है। तब भगवान् ने कहा कि दान देने से पहले *पात्र की योग्यता* तो परखनी चाहिए की वो दान लेने के योग्य है या नहीं, या उसे *किस प्रकार के दान* की जरुरत है। तुमने धन देकर उसकी मदद क्यों की, तुम उसको भोजन भी करा सकते थे।

और रही बात उसकी दरिद्रता की तो उसे देना होता तो मैं ही दे देता, वो जिस योग्य था उतना मैने उसे दिया, जब मैने ही उसकी अयोग्यता के कारण उससे सब कुछ नही दिया तो तुम्हे उसे क्या जरुरत थी धन देने की, तुम उसे भोजन भी करवा सकते थे। और तुम्हारे दिये हुए धन-दान के कारण तीन जीव हत्याए हुई है और इन हत्याओ के पाप का फल अब तुम्हे भुगतना पड़ेगा।

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Tuesday, July 9, 2019

समय के महत्व पर गांधी जी की 4 बेहतरीन कहानियां







Importance of Time
HINDI KAHANI HINDI STORIES

समय के महत्व पर गांधी जी की 4 बेहतरीन कहानियां (Story On Importance Of Time In Hindi)


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गांधी जी समय के बहुत पापंद थे | वे एक एक क्षण की कीमत भली – भांति जानते थे | इसलिए समय के महत्व को समझने के लिए गांधी जी से अच्छा उदाहरण और कुछ नहीं हो सकता –

समय के मूल्य पर अच्छी कहानी / Story 1

बात उस समय की है जब मोहनदास करमचंद गाँधी सातवीं कक्षा में पढ़ते थे | स्कूल के प्रधान अध्यापक दोरबजी एदुलजी गिमी थे | वह बहुत अनुशासन प्रिय थे और उन्होंने ऊँची के विधार्थियों के लिए व्यायाम, खेल – कूद और क्रिकेट अनिवार्य कर रखा था | मोहनदास को व्यायाम और खेल –कूद में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं थी और वे किसी में भाग नहीं लेते थे |
मोहनदास स्कूल से सीधे घर भागते थे क्योंकि उन्हें अपने पिता की सेवा-सुशुश्रा करनी होती थी | अगर वे स्कूल में पढाई के बाद खेल – कूद के लिए रुकते तो समय से अपने पिता की सेवा-सुशुश्रा के लिए घर नहीं पहुँच पाते | मोहनदास ने प्रधान अध्यापक से इस कारण खेल – कूद में भाग लेने से छूट मांगी |
उनकी यह प्रार्थना स्वीकार नहीं की गयी | एक शनिवार को जब स्कूल प्रात: लगा, खेल – कूद के लिए मोहनदास को दुबारा 4 बजे सायंकाल स्कूल जाना था | मोहनदास के पास घड़ी नहीं थी, आसमान में बादल छाए हुए थे | ठीक समय का उन्हें पता नहीं चला | जब बालक स्कूल पहुंचा, सभी लड़के वापस जा चुके थे |
दूसरे दिन प्रधान अध्यापक ने मोहनदास से खेल – कूद में गैर – हाजिर होने का कारण पूछा | यद्यपि मोहनदास ने सही सही कारण बता दिया तो भी प्रधान अध्यापक ने विश्वास नहीं किया और झूठ बोलने के लिए उन पर एक – दो आने का जुर्माना कर दिया |
बालक को बड़ी मार्मिक पीड़ा पहुंची कि उनके प्रधान अध्यापक ने उन्हें झूठा समझा | बाद में मोहनदास के पिता द्वारा पत्र लिखे जाने पर कि मोहनदास स्कूल शाम को गया था और घड़ी न होने की वजह से ठीक समय का पता नहीं चल पाया था, जुर्माना माफ़ कर दिया गया | बालक ने तब समझा कि सच बोलने के साथ साथ समय – पाबन्दी भी आवश्यक है | और तब से उस बालक ने समय की पाबन्दी के मामले में कभी चूक नहीं की |
कहानी से शिक्षा  – समय की पाबन्दी उतनी ही आवश्यक है जितना कि सत्य – मापण | बच्चों , यदि तुम समय पाबन्दी के महत्त्व को समझोगे तो कभी भी किसी गलत – फहमी  का शिकार न होगे |

समय के मूल्य पर प्रेरणादायक कहानी / Story 2

बापू समय के बहुत पाबंद थे | अपना प्रत्येक कार्य समय से करते थे | उनके कार्यक्रम इतने नियमित थे कि उनके आश्रम के लोग उनके कार्यक्रम को देखकर ठीक ठीक समय बता सकते थे और अपनी घड़ियाँ मिला सकते थे |
प्रार्थना के पहले बापू के घूमने का कार्यक्रम रहता था | एक दिन बापू गुजरात विद्यापीठ गये | वहां उन्हें बहुत देर हो गयी | प्रार्थना का समय निकट आ रहा था | उन्होंने देखा कि सामने एक साइकिल पड़ी है | उसे उन्होंने तुरंत उठाया और तेजी से चलाकर ठीक समय पर वे प्रार्थना स्थान पर  पहुँच गए |

समय के मूल्य पर शिक्षाप्रद कहानी / Story 3

बापू के शिष्यों को एक दिन समाचार मिला कि अगले दिन बापू सेवाग्राम आ रहे है | अचानक उस दिन बादल घिर आए और बहुत तेज वर्षा होने लगी | शिष्यों ने समझा कि बापू नहीं आएंगे | कोई व्यक्ति स्टेशन नहीं गया |
कुछ देर बाद लोगो ने क्या देखा कि बापू भीगते हुए पैदल आ रहे है | लोगों के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा |
बापू ने कहा कि कोई थोड़ी सी वर्षा से डर कर मैं आना क्यों रोक देता |

समय के मूल्य पर प्रेरक कहानी / Story 4

बापू से जो भी लोग मिलने आते थे, उन्हें निश्चित समय दिया जाता था | यदि कोई व्यक्ति उस नियत समय से अधिक समय लेने का प्रयास करता तो बापू तुरंत उसे अपनी घड़ी दिखाकर मुलाकात का समय खत्म हो जाने की सूचना दे देते थे | सुप्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार लुई फिशर को भी एक बार इसी प्रकार बापू जी ने घड़ी दिखाकर मुलाकात का समय समाप्त हो जाने की सूचना दी थी |
यहाँ तक कि बापू जी बोलते समय सैदव अपनी घड़ी सामने रखते थे |

समय का महत्व की कहानी से सीख Moral of The Hindi Stories on Importance of Time

बच्चों, समय पाबन्दी का बड़ा महत्त्व है, सभी काम नियत समय पर किये जाने चाहिए | इससे कोई भी समय बेकार नहीं जाता और समय का सदुपयोग होता है | साथ ही, दूसरों के भी समय का अपव्यय नहीं होता | समय के मूल्य को समझने के लिए समय की पाबन्दी अत्यावश्यक है |

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